भोपाल (मध्य प्रदेश): भारत में स्वच्छ ऊर्जा और कचरे के पुनः उपयोग को लेकर हो रहे प्रयासों को एक नया आयाम मिला है। IISER भोपाल (Indian Institute of Science Education and Research, Bhopal) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा शोध किया है, जो आने वाले समय में ईंधन उद्योग की दिशा बदल सकता है। इस रिसर्च में केले के छिलके और प्लास्टिक कचरे से बायोडीज़ल तैयार करने की तकनीक विकसित की गई है। यह खोज न सिर्फ पर्यावरण को बचाने में मददगार है, बल्कि छात्रों, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वालों और विज्ञान में रुचि रखने वाले सभी लोगों के लिए जानने योग्य महत्वपूर्ण जानकारी है।
शोध की शुरुआत और उद्देश्य
दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है – प्लास्टिक कचरा। हर साल लाखों टन प्लास्टिक पर्यावरण में फैलता है, जो मिट्टी, पानी और हवा को प्रदूषित करता है। इसी तरह फलों-सब्जियों के जैविक कचरे को भी फेंक दिया जाता है।
IISER भोपाल के वैज्ञानिकों ने सोचा – क्यों न इन दोनों को मिलाकर कुछ ऐसा बनाया जाए जो समाज को फायदा दे?
- लक्ष्य 1: कचरे को घटाना।
- लक्ष्य 2: सस्ता और टिकाऊ ईंधन तैयार करना।
- लक्ष्य 3: पर्यावरण को सुरक्षित रखना।
को-पैरोलीसिस क्या है?
इस पूरी प्रक्रिया का आधार है – Co-Pyrolysis (को-पैरोलीसिस) तकनीक।
✅ क्या होता है इसमें?
- केले के छिलके और प्लास्टिक को एक निश्चित अनुपात (25:75) में मिलाया जाता है।
- इस मिश्रण को नियंत्रित तापमान पर गर्म किया जाता है।
- गर्म करने पर यह तीन मुख्य उत्पाद देता है:
- तरल ईंधन (Pyro-Oil) – जो डीज़ल का विकल्प बन सकता है।
- गैस – जिसका इस्तेमाल घरेलू ऊर्जा के रूप में संभव है।
- चारकोल – जो पानी को शुद्ध करने जैसे उपयोग में लाया जा सकता है।
यह तकनीक सरल दिखती है, लेकिन इसके लिए लैब में विशेष तापमान नियंत्रण और उपकरणों की ज़रूरत होती है।

क्या है Pyro-Oil?
- यह एक तरल ईंधन है, जिसमें हाइड्रोकार्बन यौगिक होते हैं।
- इसमें ओलेफिन, पैराफिन, एरोमैटिक्स, एस्टर और अल्कोहल जैसे तत्व पाए जाते हैं।
- शोध से पता चला कि इसकी ऊर्जा क्षमता (हीट वैल्यू) लगभग 55 मेगाजूल प्रति किलोग्राम है, जो पारंपरिक डीज़ल से भी अधिक है।
- इसका Pour Point -25°C है, यानी ठंडे मौसम में भी आसानी से इस्तेमाल हो सकता है।
डिज़ल इंजनों में उपयोग के नतीजे
रिसर्च टीम ने इस ईंधन को सामान्य डीज़ल में 20% तक मिलाकर इंजन में टेस्ट किया।
परिणाम बेहद सकारात्मक थे:
- ✅ ईंधन की खपत कम हुई।
- ✅ इंजन की ब्रेक थर्मल एफिशिएंसी (BTE) बढ़ी।
- ✅ प्रदर्शन सामान्य डीज़ल के बराबर या बेहतर पाया गया।
क्यों है यह खोज ज़रूरी?
1️⃣ प्लास्टिक प्रदूषण का समाधान – दुनिया में बढ़ते प्लास्टिक कचरे को कम करने का तरीका मिलेगा।
2️⃣ कचरे को संसाधन में बदलना – केले के छिलके और जैविक कचरे का सही उपयोग होगा।
3️⃣ डीजल पर निर्भरता कम – लंबे समय में आयातित डीजल की मांग घट सकती है।
4️⃣ स्वच्छ भारत मिशन को बल – कचरे से ऊर्जा बनाने की दिशा में यह तकनीक मददगार होगी।
1 किलो कचरे से क्या मिलता है?
IISER भोपाल की टीम के अनुसार –
- 850 ग्राम पायरो-ऑयल (तरल ईंधन)
- 140 ग्राम गैस (खाना पकाने में उपयोगी)
- 10 ग्राम चारकोल (पानी साफ करने के लिए)
यानी 100 किलो कचरे से लगभग 85 किलो वैकल्पिक ईंधन बनाया जा सकता है।

कहां प्रकाशित हुआ शोध?
यह अध्ययन Journal of the Energy Institute और Energy Nexus जैसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हुआ। इसका मतलब यह रिसर्च केवल दावा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है।
प्रतियोगी छात्रों के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
- सस्टेनेबल एनर्जी (Sustainable Energy) और Waste Management से जुड़ा यह शोध UPSC, PCS, SSC और अन्य परीक्षाओं में पूछे जाने वाले करंट अफेयर्स और साइंस सेक्शन के लिए अहम हो सकता है।
- “Co-Pyrolysis”, “Pyro-Oil” और “IISER भोपाल” जैसे नाम और शब्द सीधे प्रश्नों में आ सकते हैं।
- यह उदाहरण ‘कचरे से ऊर्जा’ (Waste to Energy) की सबसे बेहतरीन मिसाल है।
भविष्य का ईंधन, भारत की खोज
IISER भोपाल का यह शोध दिखाता है कि कचरे को बोझ नहीं, संसाधन माना जाए तो ऊर्जा संकट का समाधान निकाला जा सकता है।
- केले के छिलके जैसे जैविक कचरे का उपयोग।
- प्लास्टिक कचरे को खत्म करने का तरीका।
- सस्ता, सुरक्षित और असरदार बायोडीज़ल का विकल्प।
यह खोज न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व के लिए पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा समाधान की दिशा में एक बड़ा कदम है।
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